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मुबंई: ६४ फीसदी लुढ़का बीटी कपास के नकली बीजों का कारोबार

देश में बीटी कपास के नकली बीजों की बिक्री में उल्लेखनीय कमी आई है। सरकारी आंकडों के मुताबिक साल २००७-२००८ में जांच के दौरान केवल ५.२३ प्रतिशत नमूने नकली पाए गए जबकी २००३-०४ में ६८.९१ प्रतिशत नमूने नकली पाए गए थे। इस हाइब्रिड बीज को बाजार में साल २००२ में लाँन्च किया गया थ। पिछले चार सालों में बीटी कपास की खेंती वाले क्षेत्रों मे जबर्दस्त उत्पादन के बावजूद नकली बीजों की बिक्री में कमी आई है। कपास विशेषाज्ञों ने कहा कि जल्दी ही अवैध बीटी पैकेंट बाजार में नजर नही आएंगे क्योंकी नियामक प्रधिकरण अप्रमाणित बीटी कपास की किस्मॊं के लिए खोजी और दंडात्मक कदम उठा रही है। बीटी कपास के नकली बीजॊं में कमी आने सें भारत विश्व का सबसे बडा़ कपास उत्पादक, उपभोक्ता और निर्यातक बनने में मदद मिली है। एग्रीकल्चरल साइंटिस्ट रिव्र्यूटमेंट बोर्ड के अध्यक्ष सी डी मायी ने कहा कि सेंट्र्ल इंस्टीट्युट फाँर काँटन रिसर्च के प्रयासों और बीटी कपास को कीमतों मे कमी से बीटी कपास के अवैध पैकेट्स को नियंत्रित करने में मेदद मिली है। नकली बिजॊं से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले राज्यों में मध्य प्रदेश, गुजरात, पंजाब और महराष्ट्र शामिल है। अकेले गुजरात मे साल २००७-०८ में नकली बीजों की प्रतिशतता घट कर २० हो गई जबकि यह साल २००३-०४ में ८० प्रतिशत था। हालांकी मध्य प्रदेश मे साल २००७-०८ में जांच किए गए बीटी किस्म के कुल नमूने में से ४५ प्रतिशत से अधिक निम्र गुणवत्ता वाले और अप्रमाणित थे। ये चार राज्य देश कें कुल कपास उत्पादन के दो तिहाई से अधिक कपास का उत्पादन करते हैं। बीटी कपास बीज के नमुने लेकर नगपुर के बीटी-रेफारल प्रयोगशाला में भेजा गया। मायी ने कहा कि एक निरक्षर किसान भी अपने खेत में एक सामान्य सा इम्यूनोलाँजिकल जांच कर सकता है। इसका इस्तेमाल बोजों, पत्तियों और फूलों के लिए किया जा सकता है।
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