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दिल्ली: अक्समात ब्रिकी शांत होने से व्यापारियों में बैचेनी(बी. टी. संवाददाता)स्थानीय थोक बाजार में अकसमात ब्रिकी शांत हो जाने से व्यापारी चिंतित दिखाई दे रहे हैं, दर असल ब्रिकी के लम्बे चलने की उम्मीद से व्यापारियों ने भरपूर स्टोक कर लिया था जिसे लेकर वे इसी फ़िराक में है कि अगर यह माल रह गया तो आगे उन्हें भूगतान तंगी का सामना करना पङेगा, क्योंकि अब आगे केवल स्कूल यूनीफ़ार्म ही चलता है तत्पश्चात बरसात के सीजन में बिक्री नितांत ठंडी पङ जाती है।
आगे फ़िर डार्क कलर की तैयारियों के चलते समर के स्टोक पुन: समर सीजन में ही बिकते हैं । दिल्ली में वर्तमान मंदी की वजह दूसरी यह भी बताई जाती है कि उत्तर भारत की ओर से भुगतान लेट होने से वहां आगे उधारी देने से हाथ रोक दिया है, बताया जाता है कि वहां के राज्य कर्मचारियों को पिछले दो तीन महीने से भुगतान न हो पाने के कारण उसका विपरित प्रभाव वहां के समूचे व्यवसाय पर पङा है उसमें भी कपङा व्यवसाय कुछ अधिक ही प्रभावित हुआ है और उसी कारण दिल्ली के कपङा बाजार में अक्समात बिक्री शांत पङ जाना मुख्य वजह समझा जा रहा है । दूसरा वहां के किसानों ने अपनी फ़सल को भी खुले बाजारों में तुरंत निकालना नहीं चाहा, क्योंकि उन्हें उचित भाव न मिलने से धीरे-धीरे फ़सल बेचना ही उचित समझा भुगतान का विपरीत प्रभाव इस कारण भी आया बताया जाता है ।
वर्तमान मांग में पापलीन, लोन, केब्रिक, लाग क्लोथ जैसी रूटीन किस्मों मेम भी बिक्री नीरस है, अगले माह लग्नसरा का छोटा का सीजन है जिससे भी उम्मीदें बनी हुई किंतु व्यापारी संतुष्टि नहीं हैं क्योंकि बिक्री अगर चली भी तो सप्ताह भर की ही रहेगी जिसमें इस समय का भरपूर स्टोक कतई रिक्त नहीं हो पाएगा।
जानकारों का कहना है कि अगर बिक्री का एक भरपूर दौर नहीं चला तो आगामी सीजन के लिए व्यापारी मुक्त मन से स्टोक नहीं भर पाएंगे, जिससे ऊंनी उत्पादों का सीजन भी प्रभावित हो सकता है, फ़िलहाल व्यापारियों को बिक्री का इंतजार है, वहीं गार्मेंट क्षेत्रों में भी कार्य ठीक-ठाक बताया जाता है यहां भी समर सीजन का स्टोक अधिक है जबकि वर्तमान में बरसात के सीजन के उत्पाद प्रारंभ हो गये हैं ।
हालांकि यह सीजन माह भर का ही रहता है जिसमें प्लास्टिक एवं रेग्जीन के उत्पाद होते हैं लेकिन इनका उत्पादन भी गिनी चुनी इकाइयों में ही रहता है क्योंकि इसके लिए हिटिंग स्टिच मशीनों की आवश्यकता पङती है जो यहां के गिने चुने गार्मेंट कारखानों में ही उपल्ब्ध हैं, अत: अन्य फ़ेब्रिक वाली इकाइयों में भी उत्पादन धीमा ही बना हुआ है। | |
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